कोटवार का पद वंशानुगत नहीं: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बेटे का दावा किया खारिज

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कोटवार की नियुक्ति से जुड़े एक मामले में अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि कोटवार का पद वंशानुगत या खानदानी नहीं है, जिस पर केवल पूर्व कोटवार का बेटा ही दावा कर सके। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि निकट संबंधी होने के आधार पर मिलने वाली प्राथमिकता तभी लागू होती है जब सभी अन्य योग्यताएं समान हों।
यह फैसला जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की सिंगल बेंच ने दिया। मामला बेमेतरा जिले के नवागढ़ तहसील के ग्राम गनियारी से जुड़ा है। यहां पदस्थ कोटवार खेलनदास पनिका का 6 नवंबर 2010 को निधन हो गया था। इसके बाद रिक्त पद के लिए उनके बेटे परदेशी राम और गांव के ही रामबिहारी साहू ने आवेदन किया था। प्रशासनिक प्रक्रिया के बाद राजस्व अधिकारियों ने रामबिहारी साहू को अधिक उपयुक्त मानते हुए उनकी नियुक्ति कर दी।
बेटे ने हाईकोर्ट में दी चुनौती
इस फैसले को परदेशी राम ने हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए कहा कि निकट संबंधी होने के कारण उन्हें पिता की जगह नियुक्त किया जाना चाहिए।
कोर्ट ने इन कारणों को माना अहम
सुनवाई के दौरान सामने आया कि पुलिस रिपोर्ट के अनुसार परदेशी राम के खिलाफ 1996 और 2013 में शांति भंग के मामलों में सीआरपीसी की धारा 107/116 के तहत प्रकरण दर्ज थे। कोटवार नियमों के अनुसार उम्मीदवार का चरित्र साफ होना अनिवार्य है।
इसके अलावा याचिका दायर करते समय परदेशी राम की उम्र 54 वर्ष थी, जबकि कोटवार की सेवानिवृत्ति आयु 60 वर्ष है। दूसरी ओर चयनित उम्मीदवार रामबिहारी साहू 34 वर्ष के थे, इसलिए उन्हें लंबी सेवा के लिए अधिक उपयुक्त माना गया।
शैक्षणिक योग्यता भी एक कारण रही। परदेशी राम तीसरी कक्षा तक पढ़े हैं, जबकि रामबिहारी साहू पांचवीं पास हैं। कोर्ट ने कहा कि बेहतर शिक्षा कर्तव्यों के निर्वहन में सहायक होती है।
विरासत का दावा करना गलत
हाईकोर्ट ने कहा कि कोटवार का पद छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता, 1959 के तहत एक सांविधिक पद है। यह कोई निजी संपत्ति नहीं है जिसे वारिस को सौंप दिया जाए।
सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट केवल यह देखता है कि निर्णय लेने की प्रक्रिया सही थी या नहीं। अंततः कोर्ट ने राजस्व मंडल और कमिश्नर के आदेश को सही ठहराते हुए याचिका खारिज कर दी।





