Kanwar Yatra 2025 : शिवभक्ति में रचा-बसा है कांवड़ यात्रा का इतिहास, जानिए इसके पीछे की पौराणिक कथाएं
Kanwar Yatra 2025

सावन का महीना भगवान शिव की आराधना का सबसे पावन समय माना जाता है। (Kanwar Yatra 2025) इस महीने में हजारों-लाखों शिवभक्त केसरिया वस्त्र पहनकर, हाथों में गंगाजल से भरी कांवड़ लेकर निकल पड़ते हैं एक ऐसी यात्रा पर, जो केवल शारीरिक नहीं बल्कि आत्मिक भी होती है। इसे कांवड़ यात्रा कहा जाता है। हर वर्ष उत्तर भारत के राज्यों में यह परंपरा भक्ति, श्रद्धा और समर्पण के साथ निभाई जाती है। लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि यह परंपरा शुरू कैसे हुई? इसका क्या धार्मिक महत्व है?
परशुराम से जुड़ी पहली मान्यता
कांवड़ यात्रा के इतिहास की बात करें तो एक मान्यता के अनुसार भगवान परशुराम को इसका प्रथम कांवड़िया माना जाता है। कहा जाता है कि उन्होंने उत्तर प्रदेश के गढ़मुक्तेश्वर से गंगाजल लाकर पुरा महादेव में भगवान शिव का जलाभिषेक किया था। यही मार्ग आज भी लाखों कांवड़िए तय करते हैं।
श्रवण कुमार की सेवा भावना
एक और जनश्रुति के अनुसार श्रवण कुमार ने अपने अंधे माता-पिता को कांवड़ में बिठाकर चारों धाम की यात्रा करवाई थी। हरिद्वार में उन्होंने गंगा स्नान कराया और साथ में गंगाजल भी लाए। यह कथा सेवा, समर्पण और तपस्या का अद्वितीय उदाहरण है, जो आज भी भक्तों को प्रेरणा देती है।
भगवान राम का बाबा बैद्यनाथ धाम जाना (Kanwar Yatra 2025)
भगवान श्रीराम की कांवड़ यात्रा की भी कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि उन्होंने सुल्तानगंज से गंगाजल लेकर बाबा बैद्यनाथ धाम (देवघर) में जलाभिषेक किया था। आज भी सावन के महीने में इस मार्ग पर करोड़ों श्रद्धालु चलते हैं और शिवलिंग पर जल चढ़ाते हैं।
रावण और पुरा महादेव की कथा
पौराणिक कथाओं में यह भी वर्णित है कि जब समुद्र मंथन से निकले हलाहल विष को भगवान शिव ने ग्रहण किया, तो उनके गले में विष अटक गया और उनका कंठ नीला हो गया। इसे शांत करने के लिए लंका नरेश रावण ने गंगाजल भरकर पुरा महादेव में शिव का अभिषेक किया। तभी से इस परंपरा को कांवड़ यात्रा का स्वरूप मिला।
देवताओं द्वारा जलाभिषेक की परंपरा
एक अन्य मान्यता के अनुसार जब शिवजी ने विष पिया, तो देवताओं ने उनका ताप शांत करने के लिए पवित्र नदियों का जल उन पर चढ़ाया। तभी से गंगाजल से शिव का अभिषेक करने की परंपरा आरंभ हुई, जो आज भी जीवित है।





