भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन तैयार, ट्रायल 26 जनवरी से; ग्रीन मोबिलिटी और स्वदेशी तकनीक की मिसाल

दिल्ली। भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन अब ट्रायल रन के लिए पूरी तरह तैयार है और बहुत जल्द यह देश की पटरियों पर दौड़ती नजर आएगी। यह भारतीय रेलवे के ग्रीन मोबिलिटी मिशन का अहम हिस्सा है, जिसके जरिए डीजल से चलने वाली ट्रेनों को पर्यावरण-अनुकूल तकनीक से बदला जा रहा है। इस पायलट प्रोजेक्ट का निर्माण अंतिम चरण में है और इसे दुनिया की सबसे एडवांस हाइड्रोजन ट्रेनों में से एक माना जा रहा है।
रेल मंत्रालय के अनुसार यह ट्रेन हरियाणा के जिंद से सोनीपत के बीच गोहाना होते हुए चलेगी। यह दुनिया की सबसे लंबी ब्रॉड गेज हाइड्रोजन ट्रेन होगी, जिसमें कुल 10 कोच होंगे। इनमें 2 ड्राइविंग पावर कार और 8 पैसेंजर कोच शामिल हैं। चेन्नई स्थित इंटीग्रल कोच फैक्ट्री (ICF) में इसे पूरी तरह स्वदेशी तकनीक से डिजाइन और तैयार किया गया है। ट्रेन की कुल पावर 2,400 किलोवॉट होगी और ऑपरेशनल स्पीड 110 किलोमीटर प्रति घंटा तय की गई है।
इस ट्रेन को ‘इको फ्रेंडली’ इसलिए कहा जा रहा है, क्योंकि यह ग्रीन हाइड्रोजन से चलेगी। जिंद में बनाए गए आधुनिक हाइड्रोजन प्लांट में पानी के इलेक्ट्रोलिसिस से हाइड्रोजन तैयार की जा रही है, जिससे न तो कार्बन उत्सर्जन होगा और न ही धुएं का प्रदूषण। प्लांट की स्टोरेज क्षमता करीब 3,000 किलो हाइड्रोजन की है और इसके लिए 11 केवी की स्थिर बिजली सप्लाई सुनिश्चित की गई है।
खूबियों की बात करें तो यह मेट्रो जैसी साइलेंट ट्रेन होगी, हर कोच में दोनों तरफ दो-दो ऑटोमैटिक दरवाजे होंगे और सभी कोच में एसी, पंखे व आधुनिक सुरक्षा सिस्टम लगाए गए हैं। मात्र 360 किलो हाइड्रोजन से यह ट्रेन लगभग 180 किलोमीटर तक का सफर कर सकती है, जो पारंपरिक ट्रेनों की तुलना में बेहद प्रभावशाली है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक 26 जनवरी 2026 को इसके ट्रायल रन की संभावना है। इसके साथ ही भारत चीन और जर्मनी जैसे देशों की कतार में खड़ा हो जाएगा, जहां हाइड्रोजन रेल तकनीक पर सफल प्रयोग हो चुका है। यह परियोजना न केवल पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़ा कदम है, बल्कि स्वदेशी इंजीनियरिंग क्षमता का भी मजबूत उदाहरण है।





