शहडोल में टाइपो एरर से निर्दोष युवक एक साल जेल में बंद, रिहाई के बाद बोला—‘कोई मेरा वक्त नहीं लौटा सकता’

मध्य प्रदेश के शहडोल में एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है, जहां एक टाइपिंग गलती ने एक निर्दोष युवक की जिंदगी का एक साल छीन लिया। 26 वर्षीय सुशांत को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया, जबकि असल में यह आदेश किसी और व्यक्ति के लिए था। एक साल बाद जब हाईकोर्ट ने गलती स्वीकारते हुए सुशांत को बरी किया, तो बाहर आते ही उनका दर्द छलक गया—“छह महीने बाद मैंने अपनी बेटी को देखा… कोई मेरा वक्त थोड़े लौटा देगा।”
जानकारी के मुताबिक, पिछले साल 4 सितंबर को सुशांत को NSA के तहत हिरासत में लिया गया था। लेकिन हिरासत आदेश में असल नाम ‘नीरजकांत द्विवेदी’ की जगह गलती से ‘सुशांत’ लिखा गया था। यह गलती लिपिकीय त्रुटि बताकर टालने की कोशिश की गई, मगर इसके आधार पर शहडोल के जिला कलेक्टर केदार सिंह ने भी डिटेंशन ऑर्डर पर हस्ताक्षर कर दिए। इस एक टाइपो ने सुशांत और उसके पूरे परिवार के जीवन को एक साल पीछे धकेल दिया।
जेल में रहते हुए सुशांत की जिंदगी में बड़ा बदलाव आया। 13 मार्च 2025 को उनकी बेटी का जन्म हुआ। लेकिन वह अपनी बेटी ‘अनाया’ को पहली बार तब देख सके जब वह छह महीने की हो चुकी थी। सुशांत ने कहा कि जेल में रहते हुए उनकी पत्नी ने अकेले संघर्ष किया, जबकि माता-पिता ने कानूनी लड़ाई के लिए कर्ज लेना पड़ा। उनका कहना है कि इस घटना ने न सिर्फ उनका समय छीना, बल्कि नौकरी पाने की संभावनाएं भी कमजोर कर दीं।
मामला हाईकोर्ट पहुंचा, जहां कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि “इसमें दिमाग का इस्तेमाल नहीं किया गया।” कोर्ट ने सुशांत को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया और कलेक्टर केदार सिंह को अवमानना नोटिस जारी किया। साथ ही, कोर्ट ने निर्देश दिया कि कलेक्टर अपनी जेब से सुशांत को 2 लाख रुपये मुआवजे के रूप में दें। राज्य सरकार को भी कोर्ट ने फटकार लगाई कि आदेश को मंजूरी देने से पहले उसकी ठीक तरह से जांच क्यों नहीं की गई।
इस मामले ने प्रशासनिक लापरवाही की गंभीरता को उजागर कर दिया है और यह सवाल उठाया है कि क्या सिर्फ एक टाइपो से किसी की जिंदगी इतनी आसानी से बर्बाद हो सकती है।





