मतांतरण कानूनों के विरुद्ध दायर याचिकाओं को चुनौती, सुप्रीम कोर्ट पहुंचा हिंदू संगठन

दिल्ली। अखिल भारतीय संत समिति ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर कई राज्यों में जबरन और गैरकानूनी मतांतरण पर रोक लगाने वाले कानूनों के विरुद्ध दायर याचिकाओं में हस्तक्षेप की अनुमति मांगी है।

यह याचिका अधिवक्ता अतुलेश कुमार के माध्यम से दायर की गई है। इसमें उत्तराखंड धर्म स्वतंत्रता अधिनियम 2018, उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म परिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम 2021, हिमाचल प्रदेश धर्म की स्वतंत्रता अधिनियम 2019 और मध्य प्रदेश धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम 2021 सहित कई राज्यों के कानूनों को चुनौती दी गई है।

सितंबर में सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी राज्यों में लागू कानूनों को चुनौती देने वाली याचिकाओं को विभिन्न हाईकोर्ट से अपने पास स्थानांतरित किया था। अब अखिल भारतीय संत समिति ने अदालत से आग्रह किया है कि उसे मामले में पक्षकार बनाया जाए और अपनी लिखित दलीलें प्रस्तुत करने की अनुमति दी जाए।

संगठन का कहना है कि संविधान के तहत धर्म प्रचार की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं है कि कोई व्यक्ति दूसरों का मतांतरण करा सकता है। समिति का दावा है कि संबंधित कानून केवल जबरन या छलपूर्वक किए गए धर्मांतरण को रोकते हैं, जबकि स्वैच्छिक रूप से धर्म बदलने की स्वतंत्रता इन कानूनों में सुरक्षित है।

इस बीच, केंद्र सरकार ने उन लोगों के लिए अनुसूचित जाति दर्जे की जांच करने वाले आयोग का कार्यकाल छह महीने के लिए बढ़ा दिया है, जो अन्य धर्मों में परिवर्तित हो चुके हैं। सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने अधिसूचना जारी कर बताया कि अब यह आयोग 10 अप्रैल, 2026 तक कार्य करेगा। यह आयोग 2022 में गठित किया गया था और इसका उद्देश्य अनुसूचित जाति के दर्जे से जुड़े दावों का परीक्षण करना है।

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