छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट: जेजे एक्ट के तहत नाबालिग को जमानत देना नियम, अपवाद नहीं

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने किशोर न्याय से जुड़े एक संवेदनशील मामले में महत्वपूर्ण आदेश पारित करते हुए नाबालिग आरोपी को जमानत देने का निर्देश दिया है। न्यायमूर्ति संजय कुमार जायसवाल की एकलपीठ ने कहा कि Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Act, 2015 की धारा 12 के प्रावधानों की अनदेखी कर निचली अदालतों द्वारा जमानत याचिका खारिज करना कानूनन गलत है।

मामला थाना खड़गवां, जिला मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर से जुड़ा है। अभियोजन के अनुसार लगभग 14-15 वर्ष की नाबालिग पीड़िता गर्भवती पाई गई, जिसके बाद मेडिकल अधिकारी की सूचना पर पुलिस ने मामला दर्ज किया। पीड़िता के बयान के आधार पर 16-17 वर्ष के नाबालिग आरोपी के खिलाफ बीएनएस की धाराओं और Protection of Children from Sexual Offences Act, 2012 (पॉक्सो एक्ट) के तहत अपराध पंजीबद्ध किया गया। आरोप था कि आरोपी ने शादी का झांसा देकर अपहरण और दुष्कर्म किया।

बचाव पक्ष ने दलील दी कि आरोपी स्वयं नाबालिग है और उसका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है। बताया गया कि पीड़िता और आरोपी लगभग डेढ़ माह तक साथ रहे, इस दौरान गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज नहीं हुई। आरोपी 7 जून 2025 से ऑब्जर्वेशन होम में है और उसकी सामाजिक स्थिति रिपोर्ट भी अनुकूल है। जमानत मिलने पर उसके किसी अपराधी संग जुड़ने या नैतिक, मानसिक खतरे की आशंका नहीं है।

राज्य शासन ने अपराध की गंभीरता का हवाला देते हुए जमानत का विरोध किया, लेकिन यह भी स्वीकार किया कि आरोपी का कोई पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और सामाजिक रिपोर्ट उसके पक्ष में है। महत्वपूर्ण तथ्य यह रहा कि पीड़िता और उसकी माता वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से उपस्थित हुईं और जमानत पर कोई आपत्ति नहीं जताई।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जेजे एक्ट की धारा 12 के तहत नाबालिग को जमानत देना सामान्य नियम है और इसे केवल विशेष परिस्थितियों में ही रोका जा सकता है, जैसे अपराधी तत्वों से जुड़ने की आशंका, नैतिक या शारीरिक खतरा या न्याय प्रक्रिया प्रभावित होने की संभावना। अदालत ने पाया कि मामले में ऐसा कोई ठोस आधार नहीं है। निचली अदालतों द्वारा यांत्रिक ढंग से जमानत खारिज करना कानून की मंशा के विपरीत है।

अदालत ने किशोर न्याय बोर्ड और विशेष पॉक्सो कोर्ट के आदेश निरस्त करते हुए नाबालिग को उसके अभिभावक की सुपुर्दगी में देने का निर्देश दिया। साथ ही यह शर्त लगाई कि अभिभावक सुनिश्चित करेगा कि नाबालिग किसी गलत संगति में न पड़े और उसकी उचित देखरेख की जाए।

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