Renaming problem: सुशासन तिहार की उड़ाई जा रही धज्जियां, नामांतरण और रजिस्ट्री का काम अटका

Renaming problem: बिलासपुर। बिलासपुर में जमीन की खरीदी-बिक्री से जुड़ा बड़ा संकट सामने आया है। जिन जमीनों की पहले बिक्री हो चुकी है, उनका नामांतरण अब तक लंबित है, और इसी कारण उसी खसरे की दूसरी जमीनों की रजिस्ट्री भी रुक गई है। NGDRS पोर्टल पर तकनीकी रूप से यह दिखाया जा रहा है कि खसरे में बिक्री योग्य रकबा शेष नहीं है, जबकि हकीकत यह है कि केवल एक टुकड़ा ही पहले बेचा गया था। इससे जमीन मालिकों के साथ-साथ खरीदारों को भी भारी परेशानी हो रही है।

बिलासपुर के कई इलाकों में जमीनों की प्लाटिंग कर एक-एक करके प्लॉट बेचे जा रहे हैं, लेकिन NGDRS में नामांतरण की धीमी प्रक्रिया ने रजिस्ट्री पर ब्रेक लगा दिया है। अगर किसी खसरे के बड़े रकबे में से एक हिस्सा पहले बेचा गया और उसका नामांतरण लंबित है, तो उसी खसरे के अन्य हिस्से की रजिस्ट्री NGDRS पोर्टल नहीं होने दे रहा। पोर्टल पर यह लिखा आता है— “प्रविष्ट खसरा नामांतरण हेतु लंबित है और विक्रय के लिए रकबा शेष नहीं है।” ऐसे में ना तो आगे की रजिस्ट्री हो पा रही है और न ही जमीन का सही रकबा दिख रहा है।

जब इस गंभीर समस्या को लेकर मीडिया ने बिलासपुर के रजिस्ट्री कार्यालय में तैनात रजिस्ट्रार आर के स्वर्णकार से जवाब मांगा गया, तो उन्होंने कैमरे के सामने बयान देने से इनकार कर दिया। उनका कहना था कि उन्हें भी अभी तक इस तकनीकी बाधा का कोई स्पष्ट समाधान नहीं पता। ऐसे में सवाल यह उठता है कि जब डिजिटल व्यवस्था में भी समाधान नहीं है और अधिकारी जवाब देने से कतरा रहे हैं, तो आम जनता किसके पास जाए? जमीन मालिकों के करोड़ों के सौदे अटक गए हैं, लेकिन सिस्टम सुधार की कोई दिशा दिखाई नहीं दे रही।

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