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सिस्टम पर सवाल: 8 दिन में बदला फैसला, सैनिक की जमीन भू-माफिया के हवाले, विधानसभा में भी गूंजा था मुद्दा

कलेक्टर ने ठुकराया, कमिश्नर ने दे दी जमीन बेचने की अनुमति

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के एक भूतपूर्व सैनिक को 1984 में सेवानिवृत्त होने के बाद सरकार ने 3.5 एकड़ जमीन जीवनयापन के लिए दी थी। उस जमीन का उपयोग सालों तक कृषि कार्य के लिए नहीं किया गया। अचानक सेवानिवृत्त सैनिक सीताराम भारत को उस जमीन का ख्याल आया और उसने पत्नी के इलाज का हवाला देते हुए उस जमीन को बेचने की अनुमति के लिए कलेक्टर बिलासपुर के पास आवेदन लगा दिया।

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चूंकि आवेदक सीताराम भारत को वह जमीन जीवनयापन के लिए पट्टे के तौर पर आवंटित की गई थी, लिहाजा कलेक्टर बिलासपुर ने आवेदन को इस तर्क के साथ खारिज कर दिया कि उसकी पेंशन आय सामान्य है और जीवनयापन के लिए कृषिभूमि का होना जरूरी है। ऐसे में कानूनी प्रावधानों के तहत आवंटित भूमि का विक्रय नहीं किया जा सकता। इस मामले पर 6 मार्च, 2024 को कलेक्टर का आदेश हो जाता है।

कलेक्टर के फैसले को चुनौती देकर भूतपूर्व सैनिक सीताराम भारत बिलासपुर कमिश्नर के पास अपील करता है। महज सप्ताहभर के भीतर यानी 14 मार्च, 2024 को कमिश्नर कार्यालय से आदेश पारित कर दिया जाता है कि सीताराम भारत को कुल आवंटित भूमि 3.50 एकड़ जमीन विक्रय करने की अनुमति दी जाती है। आलम यह है कि कलेक्टर के फैसले और आदेश को कमिश्नर बिलासपुर ने दोषपूर्ण करार देते हुए आदेश पारित किया है, जबकि प्रक्रिया के तहत कमिश्नर को इस मामले में सुनवाई के बाद रिवीजन के लिए कलेक्टर के पास भेजा जाना चाहिए था।

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अब सवाल यह उठता है कि कमिश्नर में इतनी जल्दी क्यों और कैसे दिखा दी। उन्होंने क्या पटवारी तहसीलदार से प्रतिवेदन की मांग की? अगर की तो इन 6 दिनों में सारे दस्तावेज कैसे उपलब्ध हो गए। जबकि आम जनता को इसके लिए महीनों भटकना पड़ता है। पर भूतपूर्व सैनिक सीताराम भारत के मसले पर कमिश्नर बिलासपुर को आखिर इतनी क्या जल्दी थी कि उन्होंने सप्ताहभर के भीतर अपील पर सुनवाई भी कर ली और फैसला भी पारित कर दिया, जबकि पूरा मसला एक पट्टा जमीन का है, जिसे सरकार ने उसके जीवनयापन के लिए आवंटित की थी और कानूनी प्रावधानों के तहत ऐसी जमीनों का सौदा नहीं किया जा सकता।

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दरअसल, यह पूरा खेल ग्राम सेंदरी, पटवारी हल्का नंबर 46, अरपा नदी के किनारे की उस शासकीय जमीन का है, जो 1984 में भूतपूर्व सैनिक सीताराम भारत को जीविकोपार्जन के लिए पट्टे पर दी गई थी। न खेती, न उपयोग, न ही उनके नाम दर्ज—फिर भी ये आदिवासी जमीन गैर-आदिवासियों के हवाले कर दी गई, वो भी सिर्फ चार महीने में। जिसे डायवर्सन और टाउन एंड कंट्री प्लानिंग से 53,723 वर्गफीट और 76,316 वर्गफीट के अरपा बिजनेस पार्क के लेआउट को भी हरी झंडी मिल गई।

आखिर यह चमत्कार हुआ कैसे?

आमतौर पर किसी भी सामान्य जमीन का सौदा इतनी जल्दी नहीं होता। और फिर जिस जमीन का मामला सामने आया है, वह पट्टा जमीन होने के साथ ही जीवनयापन के लिए आवंटित है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर यह चमत्कार हुआ तो कैसे? तो बता दें कि यह पूरा खेल सही मायने में रसूख का है। जिसके असल किरदार आसमा सिटी के सौरभ कुमार पांडेय और नेचर सिटी, उसलापुर के संतोष कुमार वस्त्रकार हैं। इन दोनों ने सत्ता और रसूख का जो धौंस जमाया कि कमिश्नर बिलासपुर ने कानूनी प्रावधानों को दांव पर रखकर आदेश पारित कर दिया। इसके बाद सौरभ पांडेय और संतोष वस्त्रकार ने जमीन के दो हिस्से कर कब्जा जमा लिया। इस पूरी प्रक्रिया को महज चार माह लगे। जहां अब इन रसूखदारों का आलीशान बिजनेस हब बनने जा रहा है।

यह मामला तब प्रकाश में आया जब विधानसभा कोटा विधायक अटल श्रीवास्तव ने ध्यान आकर्षण में यह प्रश्न पूछा। तब उन्होंने विधानसभा में इस मामले को लेकर ध्यानाकर्षण लगाया। चौंकाने वाली हकीकत यह है कि उनके ध्यानाकर्षण को सदन में आने ही नहीं दिया गया और उनके सवाल को नाममात्र की तरजीह नहीं मिली। उन्होंने विधानसभा में सवाल उठाया था कि अरपा विकास प्राधिकरण के तहत खरीद-बिक्री पर प्रतिबंध के बावजूद खसरा नंबर 2095/2 और 2095/9 की जमीन कैसे बिक गई? हकीकत यह है कि विधायक को अभी तक इसका जवाब नहीं मिला हैं।

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व्यवसायिक प्लॉटिंग को मिली अनुमति

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गौरतलब है कि, 10 नवंबर 2024 को बिलासपुर-रतनपुर मुख्य मार्ग पर स्थित ग्राम सेंदरी की भूमि खसरा नंबर 2095/2, रकबा 0.499124 हेक्टेयर को व्यवसायिक प्रयोजन (Commercial Plotting) के लिए अनुमति दे दी गई है। संतोष कुमार वासत्रकार के आवेदन पर टाउन एंड  कंट्री प्लानिंग विभाग ने यह स्वीकृति दी है। यह अनुमति छत्तीसगढ़ नगर तथा ग्राम निवेश अधिनियम, 2017 की धारा 30(3) के तहत सशर्त दी गई है।

सीताराम भारत को दी गई ये शासकीय जमीन न उनके नाम थी, न उसका कोई उपयोग हुआ। फिर भी, इसे दो टुकड़ों में बेचकर भू—माफियाओं के हवाले कर दिया गया। सवाल ये कि जब जमीन विधिवत उनके नाम पर थी ही नहीं, तो बिक्री की अनुमति कैसे दी गई? क्या राजस्व विभाग के आला अधिकारी आंखें मूंदकर इस लूट में शामिल थे? क्या सत्ता की छांव में यह गोरखधंधा फल—फूल रहा है? इसका जवाब जिम्मेदारों को देना होगा।

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