गुजरात में कांग्रेस का बड़ा दांव: मोदी-शाह के गढ़ से बीजेपी को चुनौती देने की तैयारी

कांग्रेस पार्टी ने 64 साल बाद एक बार फिर गुजरात की धरती पर राष्ट्रीय अधिवेशन का आयोजन किया है। यह अधिवेशन अहमदाबाद में हो रहा है, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह का गृह राज्य है। कांग्रेस इस अधिवेशन को सिर्फ एक औपचारिक बैठक नहीं, बल्कि बीजेपी को उसके सबसे मजबूत गढ़ में घेरने की रणनीति के तौर पर देख रही है। दो दिवसीय अधिवेशन में कांग्रेस के बड़े नेता मल्लिकार्जुन खरगे, राहुल गांधी, सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी समेत कई नेता शामिल हुए हैं।

‘न्याय पथ’ से नई शुरुआत का संकल्प

इस अधिवेशन की टैगलाइन रखी गई है – ‘न्याय पथ… संकल्प, समर्थन और संघर्ष’। कांग्रेस का इरादा साफ है – वह इस मंच से देश के लिए एक नई सोच, नया मॉडल और भविष्य की राजनीतिक दिशा पेश करना चाहती है। पार्टी मानती है कि अब वक्त है एक नए जनाधार को खड़ा करने का, जिसमें बीजेपी को उसके ही मॉडल से टक्कर दी जा सके।

गांधी और पटेल की विरासत से बीजेपी को घेरने की कोशिश

कांग्रेस ने अधिवेशन की शुरुआत सरदार वल्लभभाई पटेल राष्ट्रीय स्मारक से की और इसके बाद कार्यक्रम साबरमती रिवरफ्रंट पर हुआ। कांग्रेस का फोकस महात्मा गांधी और सरदार पटेल की विचारधारा पर है। पार्टी यह संदेश देना चाहती है कि बीजेपी भले ही पटेल की विरासत का दावा करती हो, लेकिन कांग्रेस ही उनकी असली राजनीतिक विरासत की उत्तराधिकारी है।

गुजरात क्यों चुना? कांग्रेस की रणनीति

गुजरात वो राज्य है जहां से नरेंद्र मोदी ने अपना ‘गुजरात मॉडल’ शुरू किया था और फिर 2014 में देश की सत्ता तक पहुंचे। कांग्रेस इस बार उसी मॉडल को चुनौती देना चाहती है। पार्टी मानती है कि अगर वो गुजरात में खुद को मजबूत कर पाती है तो ये संदेश पूरे देश में जाएगा कि कांग्रेस ही बीजेपी का असली विकल्प है।

2027 की तैयारी और नए जनाधार की तलाश

कांग्रेस की नजर अब 2027 के विधानसभा चुनावों पर है। पार्टी को उम्मीद है कि पीएम मोदी के प्रभाव में धीरे-धीरे गिरावट आएगी और वह इस मौके का फायदा उठाकर गुजरात में वापसी कर सकती है। कांग्रेस यह भी मानती है कि आम आदमी पार्टी की कमजोरी और बीजेपी के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी उसे फायदा पहुंचा सकती है।

गुजरात में कांग्रेस की स्थिति कमजोर है – सिर्फ एक सांसद और 12 विधायक। पर पार्टी अब नए सिरे से सामाजिक समीकरण साधने की कोशिश कर रही है। अधिवेशन के जरिए कांग्रेस न सिर्फ गुजरात में वापसी की राह तलाश रही है, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में अपनी खोई हुई साख भी फिर से बनाना चाहती है। अब देखना यह है कि दो दिनों के इस सियासी मंथन से कांग्रेस के हिस्से अमृत आता है या फिर वही पुरानी चुनौतियाँ सामने खड़ी रहती हैं।

 

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