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सराफा चौपाटी पर दुकान सीमा को लेकर टकराव, बिना बैठक 80 ठेलों की मंज़ूरी पर व्यापारी नाराज़

इंदौर की मशहूर सराफा चौपाटी इन दिनों अपने अस्तित्व के सबसे बड़े विवाद से गुजर रही है। नगर निगम द्वारा दुकानों की संख्या 80 तय करने और इसके बाद हटाने की कार्रवाई शुरू करने से सराफा व्यापारी और चौपाटी दुकानदार आमने-सामने आ गए हैं। बुधवार रात निगम का अमला जैसे ही ठेले हटाने पहुंचा, चौपाटी दुकानदार एकजुट हो गए और विरोध जताते हुए सीधे सराफा थाने पहुंच गए। दुकानदारों का आरोप है कि निगम ने संख्या तय करने की प्रक्रिया में बनी कमेटी और महापौर के अधिकारों को भी दरकिनार कर दिया।

दरअसल, महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने नवरात्रि के दौरान सराफा चौपाटी को नया स्वरूप देने की घोषणा की थी। इसके लिए एक विशेष कमेटी बनाई गई थी, जिसके तहत बैठक, विमर्श, सीमांकन, दौरा और परंपरागत दुकानों की पहचान कर अंतिम सूची तैयार की जानी थी। लेकिन व्यापारियों का कहना है कि महीनों बीतने के बाद भी न कोई औपचारिक बैठक हुई, न चर्चा की गई और न ही दुकानों के सत्यापन की प्रक्रिया पूरी की गई। इसके बावजूद निगम ने मुनादी कर 80 दुकानों की मंजूरी का ऐलान कर दिया, जो चाट-चौपाटी एसोसिएशन के 80 पंजीकृत सदस्यों वाली सूची के आधार पर तय बताई जा रही है।

सराफा व्यापारियों के अनुसार, समस्या केवल कार्रवाई की नहीं, बल्कि संख्या निर्धारण की पारदर्शिता की है। व्यापारियों का तर्क है कि मूल परंपरा के तहत सराफा बाज़ार में खाने-पीने के ठेलों की संख्या पहले 40-50 के बीच सीमित रहती थी, कुछ वर्षों पहले तक भी यही स्थिति थी। नवाचार और बढ़ते कारोबार के कारण दुकानों की संख्या जरूर बढ़ी, लेकिन इसका अंतिम निर्धारण कमेटी और स्थानीय व्यापार संगठनों के साथ मिलकर होना था, जैसा महापौर ने आश्वासन दिया था। लेकिन बैठक निरस्त होने का संदेश आने के तुरंत बाद मुनादी करवाना और सीधे 80 दुकानें घोषित करना, इस पूरी प्रक्रिया को संदेह के घेरे में ला रहा है।

स्थानीय व्यापार संगठनों ने भी इस फैसले पर आपत्ति दर्ज कराई है। चांदी-सोना ज्वेलरी व्यापारी संघ के अध्यक्ष हुकम सोनी ने बयान में कहा कि “मुनादी में कहा गया कि केवल मान्य सदस्य दुकान लगाएंगे, लेकिन 80 का आंकड़ा कैसे तय हुआ, इसकी कोई आधिकारिक जानकारी किसी के पास नहीं है। कमेटी की बैठक नहीं हुई, इसलिए हमारा संगठन अब स्पष्ट, लिखित और आधिकारिक आदेश की प्रतीक्षा कर रहा है।”

निगम प्रशासन का कहना है कि भीड़ प्रबंधन, सुरक्षा और यातायात नियंत्रण के लिए यह कदम ज़रूरी है, लेकिन सवाल इस पर भी उठ रहे हैं कि अगर भीड़ नियंत्रण ही उद्देश्य है, तो परंपरागत दुकानों को चिह्नित कर संख्या कम क्यों नहीं की गई? व्यापारियों ने Sandwhich जैसे व्यंजनों को लेकर भी सवाल उठाए हैं और मांग की है कि केवल वही दुकानें रखें, जो सराफा बाज़ार की मूल सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा रहीं हैं।

पूरे क्षेत्र में यह बहस तेज हो गई है कि आखिरकार फैसला बैठक से आएगा या मुनादी से? फिलहाल सराफा चौपाटी की गलियां गर्मागर्म व्यंजनों से ज्यादा बहस और नाराज़गी की तपिश महसूस कर रही हैं। व्यापारी संगठनों ने निगम से संवाद बहाल करने, कमेटी की बैठक पुनः बुलाने और ठेले वालों के सत्यापन के बाद ही अंतिम संख्या तय करने की मांग की है, ताकि चौपाटी की पहचान भी बची रहे और व्यवस्था भी बनी रहे।

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