CM साय का दावा छत्तीसगढ़ में छात्रों को मिलेगी गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा, हकीकत; प्रदेश के 260 स्कूलों में नहीं हैं शिक्षक
7127 स्कूल चल रहे केवल एक शिक्षक के भरोसे

रायपुर। छत्तीसगढ़ में शिक्षकों के युक्तियुक्तकरण को लेकर सरकार का दावा है कि इससे शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ेगी और नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप बदलाव होंगे। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। प्रदेश के 260 प्राथमिक और पूर्व माध्यमिक विद्यालयों में एक भी शिक्षक नहीं है, जबकि 7127 स्कूल केवल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं।
प्रदेश में 30,700 सरकारी प्राथमिक स्कूल और 13,149 पूर्व माध्यमिक स्कूल संचालित हैं। हालांकि छात्र-शिक्षक अनुपात राष्ट्रीय औसत से बेहतर है, फिर भी स्कूलों में शिक्षकों की भारी असमानता है। 212 प्राथमिक और 48 पूर्व माध्यमिक विद्यालय पूरी तरह शिक्षकविहीन हैं, जबकि हजारों स्कूलों में सिर्फ एक या दो शिक्षक हैं। शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 के अनुसार, 60 छात्रों पर दो सहायक शिक्षक और उसके बाद हर 30 छात्रों पर एक अतिरिक्त शिक्षक की जरूरत होती है।
अतिशेष शिक्षकों की संख्या अपर्याप्त
प्राथमिक और मिडिल स्कूलों में जरूरत के अनुसार करीब 7,296 सहायक शिक्षकों की आवश्यकता है, जबकि वर्तमान में केवल 3,608 अतिशेष शिक्षक उपलब्ध हैं। पूर्व माध्यमिक स्तर पर 5,536 शिक्षकों की जरूरत है, लेकिन सिर्फ 1,762 शिक्षक ही अतिरिक्त हैं। इससे स्पष्ट होता है कि युक्तियुक्तकरण से भी शिक्षकों की वास्तविक कमी दूर नहीं हो पाएगी।
सरकार की सफाई: स्कूल बंद नहीं होंगे, समायोजन होगा
सरकार ने स्पष्ट किया है कि किसी भी स्कूल को बंद नहीं किया जाएगा, बल्कि एक ही परिसर में प्राथमिक, पूर्व माध्यमिक और उच्च माध्यमिक विद्यालयों को क्लस्टर विद्यालय अवधारणा के तहत समायोजित किया जाएगा। इसका उद्देश्य शिक्षकों का समान वितरण, संसाधनों की बचत और ड्रॉपआउट दर में कमी लाना है।
सरकार का दावा है कि इससे बच्चों को बार-बार प्रवेश नहीं लेना पड़ेगा, खर्च कम होगा, छात्र ठहराव दर बढ़ेगी और अधोसंरचना बेहतर होगी। लेकिन जब हजारों स्कूलों में शिक्षक ही नहीं हैं, तो शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने का दावा खोखला नजर आता है। वास्तविक समाधान शिक्षकों की नियुक्ति और समुचित वितरण में ही है।





