भोपाल में शुद्ध जल आपूर्ति के दावों पर सवाल, नालियों से गुजर रहीं पेयजल पाइपलाइनें बनीं खतरा

राजधानी भोपाल में 99 प्रतिशत शुद्ध पानी की सप्लाई के दावों की जमीनी हकीकत कुछ और ही तस्वीर पेश कर रही है। शहर के पुराने इलाकों में आज भी पेयजल की पाइपलाइनें नालियों और गंदे पानी के बीच से होकर गुजर रही हैं, जिससे लोगों के स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है।
पुराने भोपाल के इतवारा, बुधवारा, बाग फरहत अफजा और गैस राहत बस्ती जैसे घनी आबादी वाले इलाकों में हालात सबसे ज्यादा चिंताजनक हैं। यहां घरों तक पहुंचने वाली निजी पाइपलाइनें नालियों के ऊपर और किनारों पर मकड़जाल की तरह फैली हुई हैं। कई जगहों पर इन पाइपों में जंग लग चुकी है, जिससे दूषित पानी के रिसाव की आशंका बढ़ जाती है।
विशेषज्ञों के अनुसार जब जलापूर्ति बंद होती है तो पाइपलाइन के भीतर वैक्यूम बन जाता है। इस स्थिति में नालियों में डूबे लीकेज प्वाइंट्स से गंदा पानी पाइप के अंदर खिंच जाता है। बाद में सप्लाई शुरू होने पर वही दूषित पानी घरों तक पहुंच जाता है। ऐसे मामलों में क्लोरिनेशन की तय मात्रा भी संक्रमण को रोकने में असफल साबित हो सकती है।
शहर का जल वितरण नेटवर्क दो अलग-अलग तस्वीरें दिखाता है। एक ओर नया भोपाल है, जहां अपेक्षाकृत आधुनिक व्यवस्था है, वहीं दूसरी ओर पुराना भोपाल है, जहां दशकों पुरानी और जर्जर पाइपलाइनें अब भी उपयोग में हैं। इसके अलावा बड़ी मात्रा में पानी लीकेज और चोरी के कारण उपभोक्ताओं तक पहुंचने से पहले ही बर्बाद हो जाता है, जो प्रदूषण के प्रवेश का रास्ता भी बनता है।
इंदौर में दूषित पानी से हुई मौतों के बाद भोपाल में जलप्रदाय व्यवस्था को सतर्क मोड पर रखा गया है। नगर निगम का कहना है कि सैंपलिंग की संख्या बढ़ा दी गई है और पुराने नेटवर्क को जीआई पाइपलाइन से बदलने की योजना है। हालांकि, तंग गलियों और पुराने ढांचे के कारण यह काम आसान नहीं माना जा रहा।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या किसी बड़े हादसे के बाद ही व्यवस्था में ठोस सुधार होंगे। इंदौर की घटना ने साफ कर दिया है कि जलप्रदाय में थोड़ी सी लापरवाही भी जानलेवा साबित हो सकती है। ऐसे में शुद्ध जल आपूर्ति के दावों के बजाय जमीनी स्तर पर ठोस कार्रवाई की जरूरत महसूस की जा रही है।





