रेत की अवैध खुदाई और महंगाई के खिलाफ कांग्रेस का जल सत्याग्रह आंदोलन..

बिलासपुर
बिलासपुर में रेत की अवैध खुदाई, भंडारण और आसमान छूती कीमतों के खिलाफ कांग्रेस ने मोर्चा खोल दिया है। बुधवार को जिला कांग्रेस कमेटी की अगुवाई में कार्यकर्ताओं और ग्रामीणों ने मंगला स्थित पाट बाबा घाट पर अरपा नदी में जल सत्याग्रह कर राज्य सरकार और जिला प्रशासन को कड़ी चेतावनी दी।
कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि राज्य सरकार अब तक छत्तीसगढ़ में रेत की कीमत तय नहीं कर सकी है, जिससे माफियाओं को खुली छूट मिल गई है।
सैकड़ों कांग्रेस कार्यकर्ता और ग्रामीण, हाथों में बैनर-पोस्टर लेकर अरपा नदी में उतरे और जल सत्याग्रह करते हुए रेत की कालाबाजारी और महंगाई के खिलाफ नारेबाजी की। प्रदर्शनकारियों की मांग है कि खनिज विभाग और प्रशासन द्वारा जब्त की गई रेत को आम जरूरतमंदों को रियायती दर पर उपलब्ध कराया जाए।
कांग्रेस के ग्रामीण जिला अध्यक्ष, विजय केसरवानी ने कहा की

बिलासपुर में रेत की बढ़ती कीमतों ने आम और मध्यमवर्गीय परिवारों की कमर तोड़ दी है। ₹6,000 तक एक ट्रॉली रेत बिक रही है। सरकार अब तक कोई रेट तय नहीं कर पाई है, और माफिया मनमानी कर रहे हैं। अगर प्रशासन अब भी नहीं चेता, तो कांग्रेस हर रेत घाट पर आंदोलन करेगी।”
जिला कांग्रेस अध्यक्ष विजय केशरवानी ने बताया कि प्रशासन द्वारा 15 जून को पांच रेत घाटों पर खनन बंद करने का आदेश दिया गया था, लेकिन इसके बावजूद अवैध खनन बदस्तूर जारी है। उन्होंने खनिज विभाग से यह सवाल भी किया कि अगर उत्खनन बंद है, तो फिर भंडारण कर रहे व्यापारियों और दलालों पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही?
शिल्पी तिवारी महिला कांग्रेस प्रदेश महामंत्री, ने कहा
अरपा मैया की छाती को बेरहमी से छलनी किया जा रहा है। इससे न सिर्फ पर्यावरण, बल्कि आम जनता की जान को भी खतरा है। बच्चों और मवेशियों की डूबने की घटनाएं आम हो चुकी हैं। भाजपा सिर्फ धर्म की बातें करती है, लेकिन प्रकृति और जीवन सुरक्षा के मुद्दों पर आंखें मूंद लेती है।
प्रदर्शन के दौरान कई संत-महात्मा, ग्रामीण और स्थानीय नागरिक भी मौजूद रहे, जिन्होंने शंखनाद कर प्रशासन को चेताने की कोशिश की। कांग्रेस नेताओं ने साफ कर दिया है कि जब तक अवैध रेत उत्खनन पर कार्रवाई नहीं होती और रेट तय कर सुलभ आपूर्ति की गारंटी नहीं दी जाती, आंदोलन जारी रहेगा।
बिलासपुर में जल सत्याग्रह के ज़रिए कांग्रेस ने सरकार पर दोतरफा दबाव बनाने की कोशिश की है—एक तरफ गरीबों के हक की लड़ाई और दूसरी ओर प्रशासनिक नाकामी को उजागर करने की रणनीति। अब देखना ये होगा कि क्या इस दबाव के बाद प्रशासन कोई ठोस कदम उठाता है या फिर ये आंदोलन और तेज़ होता है।





