भारत के दो दुश्मन और एक दोस्त देश की बड़ी डिफेंस डील अटकी, आपसी भरोसे की कमी बनी वजह

आर्थिक संकट से जूझ रहा पाकिस्तान सऊदी अरब और तुर्की के साथ मिलकर एक बड़ी त्रिपक्षीय डिफेंस डील की तैयारी कर रहा है। करीब एक साल तक चली बातचीत के बाद तीनों देशों ने इस समझौते का ड्राफ्ट भी तैयार कर लिया है, लेकिन आपसी भरोसे की कमी के चलते अब तक इस पर अंतिम सहमति नहीं बन पाई है।
इस प्रस्तावित डिफेंस डील में पाकिस्तान और तुर्की ऐसे देश हैं जिनके भारत के साथ रिश्ते तनावपूर्ण रहे हैं, जबकि सऊदी अरब भारत का करीबी मित्र माना जाता है। यही कारण है कि यह समझौता क्षेत्रीय राजनीति और भारत की रणनीतिक स्थिति के लिहाज से अहम माना जा रहा है।
पाकिस्तान के रक्षा उत्पादन मंत्री के अनुसार, बीते कुछ वर्षों में क्षेत्रीय हिंसा और अस्थिरता बढ़ी है, ऐसे में देश एक मजबूत सुरक्षा ढांचा चाहता है। इसी उद्देश्य से सऊदी अरब और तुर्की के साथ मिलकर यह त्रिपक्षीय डील प्रस्तावित की गई है। पाकिस्तान का कहना है कि ड्राफ्ट समझौता तीनों देशों के पास मौजूद है और लगातार विचार-विमर्श चल रहा है, लेकिन अंतिम सहमति जरूरी है।
वहीं तुर्की की ओर से साफ किया गया है कि बातचीत जरूर हुई है, लेकिन अब तक किसी तरह के समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए गए हैं। तुर्की का मानना है कि किसी भी रक्षा समझौते से पहले देशों के बीच आपसी विश्वास और क्षेत्रीय सहयोग मजबूत होना चाहिए। भरोसे की कमी से ही क्षेत्र में दरारें, अस्थिरता और संघर्ष जैसी स्थितियां पैदा होती हैं।
जानकारों के अनुसार, अगर भविष्य में यह डील होती है तो इसका सीधा अर्थ यह होगा कि तीनों देशों में से किसी एक पर हमला होने की स्थिति में इसे सभी पर हमला माना जाएगा। हालांकि इसका यह मतलब नहीं होगा कि भारत क्षेत्र में घिर गया है, लेकिन भारत को यह मानकर चलना होगा कि पाकिस्तान पूरी तरह अकेला नहीं है और उसके पास सहयोगी देश मौजूद हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की संभावित डिफेंस डील को देखते हुए भारत को अपनी सैन्य तैयारियों, रणनीतिक सतर्कता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग नेटवर्क को और मजबूत करने की जरूरत होगी। फिलहाल भरोसे की कमी के चलते यह समझौता अटका हुआ है, लेकिन बातचीत का सिलसिला जारी है।





