उज़्बेक ताकत से हारा बाबर, फरगना-समरकंद से बेदखली के बाद भारत में रखी मुगल सल्तनत की नींव

जहीरुद्दीन मुहम्मद बाबर, जिसने भारत में तीन शताब्दियों से अधिक समय तक राज करने वाले मुगल साम्राज्य की प्रारंभिक नींव रखी, उसकी सत्ता की शुरुआत मध्य एशिया में संघर्ष और बेदखली से भरी रही। बाबर का जन्म फरगना के अंदीजान में 14 फरवरी 1483 को हुआ था, जो आज के उज़्बेकिस्तान का हिस्सा है। पिता के तरफ से वह तैमूर और मां की ओर से चंगेज खान के वंशज थे। बरलास जनजाति से जुड़े होने की वजह से उन्हें “मुगल” नाम मिला, जिसने फारसी-तुर्की संस्कृति को अपना लिया था।
पिता उमर मिर्जा की मृत्यु के बाद 1494 में कम उम्र में बाबर को फरगना का शासक घोषित किया गया, लेकिन नजदीकी रिश्तेदारों और स्थानीय सरदारों की साजिशों के बीच उन्हें जल्द ही गद्दी छोड़नी पड़ी। लंबा निर्वासन, बिखरी सेना और संसाधनों की कमी के बावजूद बाबर सत्ता वापसी की कोशिश में लगे रहे।
साल 1501 में सबसे बड़ी चुनौती उज़्बेक शासक मुहम्मद शैबानी खान से मिली। समरकंद के मैदान में हुए निर्णायक युद्ध में शैबानी खान ने बाबर की सेना को बुरी तरह पराजित कर दिया। इसी हार के साथ फरगना और समरकंद पर बाबर का कब्जा खत्म हो गया और उन्हें मध्य एशिया से पीछे हटना पड़ा।
इसके बाद 1504 में बाबर ने हिन्दुकुश पर्वत पार कर काबुल पर कब्जा जमाया और एक नई सेना संगठित की। इसी दौर में फारस के सफ़वी शासक इस्माइल प्रथम ने शैबानी खान को हराकर मार दिया, जिसके बाद बाबर को उनकी तरफ से प्रतिनिधि के रूप में समरकंद पर कुछ समय शासन चलाने का अवसर मिला, लेकिन उज़्बेक गुटों ने 1511 में पुनः समरकंद पर कब्जा कर लिया।
मध्य एशिया में अस्थायी सत्ता और बार-बार बेदखली के बाद बाबर ने दक्षिण की ओर रुख किया। 1526 में पानीपत की पहली लड़ाई में उन्होंने इब्राहिम लोदी को हराकर दिल्ली सल्तनत का अंत कर दिया और भारत में मुगल शासन की शुरुआत की। हालांकि, मातृभूमि से उनका लगाव बना रहा और उनकी अंतिम इच्छा के मुताबिक, उनकी कब्र काबुल में बनाई गई।
बाबर के बाद भी उज़्बेकों और मुगल पीढ़ियों के बीच संघर्ष जारी रहे, लेकिन मध्य एशिया में फिर से स्थायी सल्तनत हासिल करने में उन्हें सफलता नहीं मिली।





