कर्नाटक में कुर्सी की लड़ाई नई नहीं, पहले भी छिड़ी थी त्रिकोणीय टक्कर

दिल्ली। कर्नाटक की सत्ता को लेकर चल रही खींचतान कोई नई बात नहीं है। हाल ही में मुख्यमंत्री सिद्दरमैया और उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के बीच सत्ता संतुलन को लेकर विवाद सुर्खियों में रहा। दोनों नेताओं ने पिछले हफ्ते नाश्ते की टेबल पर मुलाकात की, जिससे तनाव थोड़ा कम होता दिखा। हालांकि, यह सियासी tussle कर्नाटक की राजनीति के पुराने अध्याय की याद दिलाती है, जब मुख्यमंत्री पद को लेकर लंबी जद्दोजहद देखने को मिली थी।
ऐसा ही संघर्ष साल 2006-07 में हुआ था। उस समय तीन अलग-अलग पार्टियों के बीच सत्ता की लड़ाई चरम पर थी। कहानी की शुरुआत 2004 के विधानसभा चुनावों से हुई, जहां कांग्रेस, जनता दल (सेक्युलर) और बीजेपी तीनों ही बहुमत से दूर रह गईं। ऐसे में जेडीएस ने “किंगमेकर” की भूमिका निभाई और कांग्रेस के साथ गठबंधन करके सरकार बनाई।
लेकिन यह गठबंधन ज़्यादा समय टिक नहीं पाया। 2006 में जेडीएस नेता एच.डी. कुमारस्वामी ने कांग्रेस का साथ छोड़कर बीजेपी से हाथ मिला लिया। समझौते के तहत तय हुआ कि दोनों पार्टियां 20-20 महीने के लिए मुख्यमंत्री पद साझा करेंगी। पहले चरण में कुमारस्वामी मुख्यमंत्री बने, लेकिन सत्ता का यह समीकरण ज्यादा दिन तक सुखद नहीं रहा।
बीजेपी के 20 महीने पूरे होने के बाद जब सत्ता हस्तांतरण की बारी आई तो जेडीएस अपने वादे से पलट गई। कुमारस्वामी ने पद छोड़ने से इनकार कर दिया। इससे बीजेपी बेहद नाराज हो गई और गठबंधन टूट गया। स्थिति बिगड़ते देख अक्टूबर 2007 में कुमारस्वामी ने इस्तीफा दे दिया। राज्यपाल ने विधानसभा भंग कर राष्ट्रपति शासन की सिफारिश की।
करीब छह महीने तक राजनीतिक अस्थिरता बनी रही। आखिरकार मई 2008 में चुनाव हुए और बीजेपी ने 110 सीटें जीतकर पहली बार अपने दम पर सरकार बनाई।
इस तरह कर्नाटक की राजनीति बार-बार साबित करती है कि यहां सत्ता की कुर्सी की राह बेहद टेढ़ी, रोमांचक और टकराव से भरी रहती है।





