पत्नी से तलाक लेने पति ने बताया मानसिक बीमारी, कोर्ट ने अपील खारिज की

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक तलाक मामले में अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल डॉक्टर का प्रिस्क्रिप्शन पत्नी को मानसिक रोगी साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। मानसिक बीमारी के आधार पर विवाह रद्द करने के लिए ठोस सबूत और इलाज करने वाले मनोचिकित्सक की गवाही जरूरी है। जस्टिस रजनी दुबे और जस्टिस ए.के. प्रसाद की डिवीजन बेंच ने पति की अपील खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के फैसले को सही ठहराया।

दरअसल, रायगढ़ निवासी युवक ने 2008 में शादी की थी और उनकी दो बेटियां भी हैं। कुछ साल बाद दंपत्ति में विवाद बढ़ा और पत्नी 2018 से मायके में रहने लगी। पति ने 2021 में फैमिली कोर्ट में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 12 (1)(बी) के तहत तलाक की अर्जी लगाई। उसका आरोप था कि पत्नी सिजोफ्रेनिया से पीड़ित है और शादी के बाद उसका व्यवहार असामान्य हो गया। फैमिली कोर्ट ने सबूतों की कमी बताते हुए तलाक की अर्जी खारिज कर दी। इसके बाद पति ने हाईकोर्ट में अपील की और दावा किया कि डॉक्टर ने पत्नी को मानसिक रोगी प्रमाणित किया है।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल प्रिस्क्रिप्शन के आधार पर किसी को मानसिक रोगी नहीं कहा जा सकता। इस मामले में पति यह साबित करने में नाकाम रहा कि विवाह के समय से पत्नी मानसिक बीमारी से ग्रसित थी। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में विशेषज्ञ डॉक्टर की गवाही और ठोस प्रमाण जरूरी हैं। नतीजतन, हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को कानूनी रूप से उचित मानते हुए पति की तलाक अपील खारिज कर दी।

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