उत्तरकाशी धराली हादसा: एक्सपर्ट बोले देवदार के जंगल बचा सकते थे जान, योजनाओं के चलते संख्या हो रही कम

दिल्ली। उत्तरकाशी के धराली में 5 अगस्त को हुए बादल फटने और बाढ़ के हादसे में अब तक 5 लोगों की मौत और 100 से अधिक लापता हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इलाके में पुराने समय की तरह घने देवदार के जंगल होते, तो यह आपदा टल सकती थी।
हिमालय विशेषज्ञ प्रोफेसर शेखर पाठक के अनुसार, कभी उत्तराखंड के उच्च हिमालय में प्रति वर्ग किलोमीटर 400-500 देवदार पेड़ होते थे, जो बादल फटने और भूस्खलन के समय मलबा-पानी को रोकते थे। लेकिन 1830 में फैडरिक विल्सन द्वारा शुरू हुई पेड़ों की कटाई आज भी जारी है, जिससे अब औसतन 200-300 कमजोर पेड़ ही बचे हैं।
धराली की तबाही वाले रास्ते पर पहले घना देवदार जंगल था, जो अब खत्म हो चुका है। भूगर्भ वैज्ञानिक एमपीएस बिष्ट के अनुसार, यह इलाका पहले ग्लेशियर नदी के बीच था और उपजाऊ मिट्टी से भरपूर था, जिस पर पहले जंगल थे, फिर खेत और बाद में बाजार-होटल बन गए। इस बार बाढ़ और मलबे की चपेट में बाजार आया, जबकि पुराना गांव सुरक्षित है।
भूगर्भ वैज्ञानिक एसपी सती का सुझाव है कि प्रभावित गांवों को हटाकर यहां नए सिरे से देवदार के जंगल लगाए जाएं। चकराता में 500 साल पुराना देवदार का पेड़ आज भी मौजूद है, जो इस प्रजाति की मजबूती का उदाहरण है। हादसे के बाद सेना और NDRF टीम एडवांस पेनिट्रेटिंग रडार से मलबे में दबे लोगों की तलाश कर रही है, जो बिना खुदाई के जमीन के 20-30 फीट नीचे तक लोगों या शवों का पता लगा सकता है।





