मुफ्त इलाज का वादा, लेकिन न मितान, न कार्ड – आयुष्मान योजना की हकीकत सामने आई

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ में आयुष्मान भारत योजना के तहत मरीजों को बेहतर और मुफ्त इलाज देने का दावा किया जाता रहा है, लेकिन अब इस योजना की सच्चाई उजागर हो रही है। राज्य सरकार ने 30 अप्रैल 2025 को अचानक ही लगभग 500 स्वास्थ्य मितानों की सेवाएं समाप्त कर दीं, जिससे मरीजों और अस्पतालों दोनों के सामने गंभीर संकट खड़ा हो गया है।

स्वास्थ्य मितान वे प्रशिक्षित कर्मी थे जो बीते एक दशक से आयुष्मान कार्ड बनाने, डेटा एंट्री, क्लेम वेरिफिकेशन जैसे जरूरी तकनीकी कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे। नीति आयोग और अन्य राष्ट्रीय रिपोर्टों में छत्तीसगढ़ की आयुष्मान योजना की सफलता के पीछे इन मितानों के योगदान को प्रमुखता से स्वीकार किया गया है।

मरीजों की बढ़ी मुश्किलें
इनकी सेवाएं बंद होने के बाद अब ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में मरीज आयुष्मान कार्ड नहीं बनवा पा रहे, जिससे उन्हें मुफ्त इलाज से वंचित होना पड़ रहा है। बिलासपुर स्थित सिम्स अस्पताल में इलाज के लिए आए एक मरीज के परिजनों ने बताया कि उनका आयुष्मान कार्ड नहीं बना और अस्पताल प्रबंधन ने फ्री इलाज देने से इनकार कर दिया।

संकट में योजना की संरचना
स्वास्थ्य मितानों की बर्खास्तगी के कारण न केवल इन कर्मचारियों का भविष्य अधर में है, बल्कि योजना का संचालन भी प्रभावित हो रहा है। तकनीकी रूप से दक्ष इन कर्मियों के बिना लाभार्थियों का डेटा अपलोड, क्लेम प्रोसेसिंग और नई पात्रता जांच जैसी प्रक्रियाएं धीमी पड़ गई हैं।

सवालों के घेरे में सरकार
इस अचानक फैसले को लेकर सरकार न तीव्र प्रतिक्रिया दे रही है और न ही वैकल्पिक व्यवस्था की कोई घोषणा की गई है। ऐसे में मुफ्त इलाज का वादा महज़ कागज़ी दावा बनकर रह गया है, जबकि ज़मीनी हकीकत में मरीज़ भटकते नज़र आ रहे हैं।

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