पिता के कर्ज की अदायगी: क्या बेटा जिम्मेदार है? सुप्रीम कोर्ट के फैसले से साफ हुई स्थिति

अक्सर लोगों के मन में यह सवाल होता है कि यदि पिता की मृत्यु हो जाती है और उन पर कोई ऋण बकाया है, तो क्या बेटे को वह कर्ज चुकाना पड़ेगा? इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट्स के कई फैसले आ चुके हैं, जिनसे यह स्पष्ट होता है कि उत्तराधिकारी की जिम्मेदारी केवल उस संपत्ति की सीमा तक होती है जो उन्हें विरासत में मिली हो। भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 के अनुसार, यदि मृतक ने कोई कर्ज लिया था, तो सबसे पहले उसकी संपत्ति से उस ऋण का भुगतान किया जाता है।
निजी दायित्व तभी जब गारंटी दी हो या लाभ मिला हो
भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 के अनुसार, ऋण का कानूनी दायित्व केवल उसी व्यक्ति पर होता है जिसने उस ऋण के लिए अनुबंध किया हो। अगर पुत्र ने पिता के ऋण के लिए कोई गारंटी नहीं दी है, और उसे पिता की संपत्ति से कोई लाभ नहीं मिला है, तो उस पर किसी प्रकार की व्यक्तिगत जिम्मेदारी नहीं बनती।
हालांकि यदि बेटा ऋण के लिए गारंटर था, तो उसे उस कर्ज की पूरी भरपाई करनी होगी।
सुप्रीम कोर्ट के अहम फैसले
सुप्रीम कोर्ट ने के. राजामौली बनाम एवीकेएन स्वामी (2001) के मामले में यह स्पष्ट किया कि यदि उत्तराधिकारी को कोई संपत्ति नहीं मिली है, तो वह ऋण चुकाने के लिए उत्तरदायी नहीं है।
वहीं सीआईटी बनाम स्व. ओमप्रकाश झुनझुनवाला की संपत्ति (2002) के मामले में यह तय किया गया कि उत्तराधिकारी की जिम्मेदारी केवल उस संपत्ति तक सीमित है जो मृतक से उन्हें प्राप्त हुई है।
हिंदू कानून के अनुसार कुछ मामलों में अपवाद
हिंदू कानून के तहत, यदि संपत्ति संयुक्त परिवार की है और ऋण सामाजिक, धार्मिक या पारिवारिक जरूरतों के लिए लिया गया है, तो उस स्थिति में उत्तराधिकारी उस ऋण के लिए उत्तरदायी हो सकते हैं। हालांकि, यह भी संपत्ति की सीमा तक ही लागू होता है।
पिता की मृत्यु के बाद यदि कोई ऋण बकाया है, तो पुत्र केवल पिता की छोड़ी गई संपत्ति की सीमा तक ही उत्तरदायी है। यदि कोई संपत्ति विरासत में नहीं मिली है और न ही किसी प्रकार की गारंटी दी गई है, तो कानूनी रूप से कर्ज चुकाने का कोई दायित्व नहीं बनता। किसी विशेष मामले में उचित कानूनी सलाह के लिए वकील से संपर्क जरूर करें।





