राहुल गांधी की नई रणनीति – 85% आबादी पर कांग्रेस का फोकस

कांग्रेस नेता राहुल गांधी अब बीजेपी के हिंदुत्व की राजनीति के मुकाबले में नई रणनीति पर काम कर रहे हैं। उनका फोकस देश की 85% आबादी यानी एससी, एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यकों के वोटों पर है। इसी रणनीति के तहत उन्होंने हाल ही में तेलंगाना और बिहार में बड़े बदलाव किए हैं, जो मंडल-कमंडल की राजनीति की याद दिला रहे हैं।
तेलंगाना और बिहार में बदलाव
तेलंगाना में राहुल गांधी के दबाव में आरक्षण की सीमा 50% से पार करने का फैसला लिया गया। यह कदम कांग्रेस के उस फैसले का हिस्सा है जिसमें जनसंख्या के आधार पर आरक्षण देने की वकालत की जा रही है। इसके अलावा, बिहार में भी कांग्रेस ने सियासी कदम उठाते हुए भूमिहार नेता अखिलेश प्रसाद सिंह को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाकर दलित नेता राजेश राम को जिम्मेदारी सौंपी है। अखिलेश प्रसाद सिंह को लालू यादव का करीबी माना जाता है, लेकिन राहुल गांधी ने इस बात की परवाह किए बिना अपने दांव को आगे बढ़ाया।
जाति की राजनीति पर फोकस
राहुल गांधी का यह कदम सिर्फ तेलंगाना और बिहार तक सीमित नहीं है। इससे पहले कर्नाटक में भी कांग्रेस के नेतृत्व में जातिगत सर्वे कराए गए थे। कांग्रेस संगठन के सचिवों और महासचिवों की नियुक्तियों में भी जातिगत समीकरणों का ध्यान रखा जा रहा है। कांग्रेस की इस रणनीति का मकसद एससी, एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यक वोट बैंक को एकजुट करना है।
हिंदुत्व बनाम जाति की राजनीति
राहुल गांधी की यह रणनीति 90 के दशक की मंडल-कमंडल राजनीति की याद दिला रही है। एक तरफ बीजेपी हिंदुत्व की राजनीति पर फोकस कर रही है, तो दूसरी तरफ राहुल गांधी जाति आधारित राजनीति को आगे बढ़ा रहे हैं। राहुल गांधी की रणनीति में ओबीसी आरक्षण को बढ़ाना और अल्पसंख्यकों के हित में फैसले लेना शामिल है।
कर्नाटक में सरकारी ठेकेदारी में अल्पसंख्यकों को 4% आरक्षण देने का कदम भी इसी दिशा में उठाया गया है। इसके अलावा, राहुल गांधी के संविधान सम्मेलन दलितों को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं।
हालांकि, राहुल गांधी की इस रणनीति से उनके सहयोगी दल जैसे राजद, सपा, डीएमके और जेएमएम असहज महसूस कर सकते हैं। लेकिन राहुल गांधी फिलहाल किसी भी दबाव की परवाह किए बिना अपनी राजनीति को आगे बढ़ाने में जुटे हुए हैं।





