बस्तर के इस मेले में हजारों देवी-देवता शामिल होने आते है !

रायपुर : छत्तीसगढ़ का बस्तर संभाग खास परंपराओं के लिए जाना जाता है… और यहां के लोगों का हर त्योहार मनाने का भी अपना अलग ढंग है… और अब त्योहारों की बात हो ही रही है… तो आप सबने बस्तर दशहरे की बात सुनी ही होगी… जो सबसे लंबा चलने वाला त्योहार है.. और 75 दिनों तक मनाया जाता है.. लेकिन क्या आप जानते हैं बस्तर में एक और त्योहार है.. जो लंबा चलता है… 75 दिनों तक तो नहीं… लेकिन 10 दिनों तक चलता है… ये त्योहार है…  फागुन यानी होली का…. तो चलिए आज बात करते हैं बस्तर संभाग के दंतेवाड़ा जिले की फागुन मेले की…..

15 मार्च तक चलेगा फागुन मेला

15 मार्च को होली है… और 5 मार्च से इस मेले की शुरुवात हो गई है..  दंतेवाड़ा में कलश स्थापना के बाद इस प्रसिद्ध फागुन मेले की शुरुआत हुई। और पहली पालकी निकली। वहीं 15 मार्च को देवी-देवताओं की विदाई होगी… और तब तक फागुन मेला चलेगा। हर दिन मां दंतेश्वरी की विशेष पूजा अर्चना होगी… साथ ही आखेट की विभिन्न रस्म अदा कर 600 साल पुरानी परंपरा निभाई जाएगी…

विभिन्न राज्यों से देवी-देवता होंगे शामिल

वहीं इस फाल्गुन मेले की शुरुवात से पहले बसंत पंचमी के दिन मां दंतेश्वरी मंदिर में त्रिशूल की स्थापना की गई… इस फागुन मेले की खास बात ये है कि इस मेले में न सिर्फ छत्तीसगढ़, बल्कि विभिन्न राज्यों से जैसे- ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना जैसे विभिन्न राज्यों से भी हजारों देवी-देवता शामिल होने आएंगे.. वहीं इस साल फागुन मेला के लिए टेंपल कमेटी ने करीब 45 लाख रुपए का बजट रखा है…

शिकार के लिए शुरु हुई थी परंपरा

चलिए अब इस परंपरा से जुड़े कुछ पहलुओं के बारे में विस्तार से समझते हैं… स्थानीय लोगों के मुताबिक, करीब 600 साल पहले आखेट यानी कि शिकार प्रचलित था। जंगली जानवर किसानों की फसलें खराब कर देते थे.. ग्रामीण इस समस्या के निदान के लिए राजा-महाराजा के पास गए.. तब तत्कालीन राजा ने जानवरों का शिकार करना शुरू किया था… राजा जब शिकार करते, तो दैवीय शक्ति की वजह से तीर लगने के बाद भी जानवर मरते नहीं थे… फिर राजा ने जानवरों के शिकार के लिए आराध्य देवी माता दंतेश्वरी की आराधना कर अनुमति ली थी.. इसके बाद शिकार शुरू किया गया था… और इस दिन से ही फागुन मड़ई की शुरुआत हुई थी… इसके बाद धीरे-धीरे स्थानीय देवी-देवताओं को भी इस मड़ई में शामिल किया जाने लगा..

बसंत पंचमी के दिन से शुरु होती थी परंपरा

वहीं दंतेवाड़ा के दंतेश्वरी मंदिर के पुजारी लोकेंद्र नाथ जिया की माने तो फागुन मेला शिकार के लिए प्रसिद्ध है… इसमें रस्में तिथि और समय के अनुसार 10 से 11 दिनों तक चलती हैं… और अब शिकार का नाट्य रूपांतरण कर परंपरा निभाई जाती है.. वहीं हर साल बसंत पंचमी के दिन माता दंतेश्वरी के मंदिर में गरुड़ स्तंभ के सामने त्रिशूल स्थापित किया जाता है.. यह मेला शुरू करने की सबसे पहली रस्म होती है। फिर कुछ दिन बाद फागुन महीने में देवी की पूजा समेत दूसरी रस्में शुरू होती हैं… इस बीच मेले में शामिल होने के लिए निमंत्रण पत्र तैयार किया जाता है, जिसे देवी-देवताओं को भेजा जाता है…

मेले के अंत में देवी-देवताओं को दी जाती है विदाई

बता दें कि फागुन मेले में नवरात्रि की ही तरह माता दंतेश्वरी की 9 दिनों तक विशेष पूजा-अर्चना होती है। 10वें दिन यानी होली के दिन मेला भरता है। यहां ताड़ के पत्तों से होलिका दहन करने की परंपरा भी है,.. मेले के अंत में देवी-देवताओं को विदाई दी जाती है। श्रीफल और नेग भी दिया जाता है…वहीं पिछले साल बस्तर के अलावा ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और महाराष्ट्र बॉर्डर से भी देवी-देवता आए थे…और पहली बार इस उत्सव में मां भद्रकाली और मेडाराम की देवी भी शामिल हुईं थीं… ओडिशा के 7 से 8 देवी-देवता मेले में शामिल हुए थे। इनमें कोसागुमड़ा गांव से हिंगलाजिन, तेलंगाना के मेडाराम से चिकलादई और बामनदई माता मेले में शामिल हुईं… और बस्तर से काली कंकालीन देवी समेत अन्य देवी-देवता शामिल हुए थे…

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