बिलासपुर में नक्शा स्वीकृति घोटाले का खुलासा, फर्जी आर्किटेक्ट के नाम पर 400 से ज्यादा मंजूरियां!

बिलासपुर। बिलासपुर में शहरी विकास और निर्माण स्वीकृतियों से जुड़ा एक बड़ा कथित घोटाला सामने आया है, जिसने नगर निगम बिलासपुर और टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग (TCP) की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। दस्तावेजों की जांच में एक ही प्रोजेक्ट में फ्लैटों की संख्या और मंजिलों को लेकर भारी विसंगति सामने आई है। साथ ही सैकड़ों निर्माण स्वीकृतियां एक ऐसे कथित आर्किटेक्ट के नाम पर जारी होने का मामला सामने आया है, जिसका वास्तविक अस्तित्व ही संदिग्ध बताया जा रहा है।
यह पूरा मामला शहर के अज्ञया नगर क्षेत्र में प्रस्तावित ‘मेसर्स अनंत रियाल्टी’ प्रोजेक्ट से जुड़ा बताया जा रहा है। आरोप है कि बिल्डर नमन गोयल ने विभागीय अधिकारियों की कथित मिलीभगत से मास्टर प्लान और निर्माण नियमों को दरकिनार कर विकास अनुज्ञा हासिल की।
फ्लैट और मंजिलों में भारी अंतर
दस्तावेजों के अनुसार प्रोजेक्ट के लिए प्रस्तुत एरिया स्टेटमेंट में चार मंजिलों पर 60 फ्लैट बनाने का प्रस्ताव था। लेकिन विभाग द्वारा स्वीकृत नक्शे में फ्लैटों की संख्या 90 और मंजिलें छह दर्शाई गईं। विशेषज्ञों का कहना है कि एरिया स्टेटमेंट और स्वीकृत नक्शे के बीच इतना बड़ा अंतर सामान्य प्रशासनिक त्रुटि नहीं हो सकता।
फर्जी आर्किटेक्ट का नाम सामने आया
इस मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू उस आर्किटेक्ट का नाम है जिसके माध्यम से नक्शा तैयार किया गया। दस्तावेजों में ‘विकास सिंह’ नाम दर्ज है, लेकिन शहर में इस नाम का कोई पंजीकृत आर्किटेक्ट या इंजीनियर नहीं मिला।
जांच में यह भी सामने आया कि इसी नाम का उपयोग पहले भी कई परियोजनाओं के नक्शे स्वीकृत कराने में किया गया था। बाद में संदेह होने पर नगर निगम ने इस नाम से जुड़े लाइसेंस को निलंबित और ब्लैकलिस्ट कर दिया था।
महुआ होटल मामले में भी सामने आया नाम
हाल ही में पुराने बस स्टैंड के पास स्थित महुआ होटल पर अवैध निर्माण के खिलाफ कार्रवाई हुई थी। जांच में पता चला कि होटल का नक्शा भी इसी कथित आर्किटेक्ट विकास सिंह के नाम से स्वीकृत हुआ था। निर्माण के दौरान ओपन स्पेस और पार्किंग जैसी अनिवार्य शर्तों का उल्लंघन भी पाया गया था।
400 नक्शे और 150 लेआउट मंजूर
विभागीय फाइलों की जांच में पता चला कि शहर में इसी कथित आर्किटेक्ट के नाम पर 400 से अधिक भवन नक्शे और 150 से ज्यादा लेआउट स्वीकृत किए गए हैं। इससे आशंका जताई जा रही है कि निर्माण स्वीकृतियों में एक संगठित नेटवर्क काम कर रहा था।
EWS आवास में भी गड़बड़ी का आरोप
प्रोजेक्ट में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए आवास देने का दावा किया गया था। बिल्डर ने शपथपत्र में कहा था कि तिफरा के खसरा नंबर 407/7 में गरीबों के लिए फ्लैट बनाए जाएंगे। लेकिन राजस्व रिकॉर्ड में यह जमीन बिल्डर के नाम पर दर्ज नहीं मिली, जिससे विभाग को झूठा शपथपत्र देने की आशंका भी जताई जा रही है।
एक दिन में 29 लेआउट मंजूर
जांच में यह भी सामने आया कि कुछ मामलों में एक ही दिन में 29 लेआउट फाइलों को मंजूरी दे दी गई। शहरी नियोजन विशेषज्ञों के अनुसार इतनी बड़ी संख्या में फाइलों को एक दिन में मंजूरी देना सामान्य प्रक्रिया के तहत लगभग असंभव है।
करोड़ों के लेनदेन की आशंका
नगर निगम के अनुमान के अनुसार एक एकड़ रिहायशी लेआउट की स्वीकृति में 75 हजार से 2.5 लाख रुपये तक और सामान्य मकान के नक्शे के लिए 8 हजार से 20 हजार रुपये तक शुल्क लगता है। ऐसे में 400 से अधिक नक्शों और 150 लेआउट की मंजूरी में करोड़ों रुपये के कथित लेनदेन की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
प्रशासन की कार्रवाई पर निगाह
इस पूरे घटनाक्रम ने शहर के शहरी विकास तंत्र की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सामाजिक संगठनों और नागरिकों ने मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की मांग की है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इस कथित नक्शा और लेआउट घोटाले में शामिल बिल्डर और विभागीय अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी या नहीं। फिलहाल इस प्रकरण ने बिलासपुर के रियल एस्टेट सेक्टर और प्रशासनिक तंत्र में हलचल मचा दी है।





