बस्तर के जंगलों का कड़वा सच: 11 साल माओवादियों के बीच रही फगनी ने खोले राज; कोसा को पसंद थी दूध की चाय और सिगरेट; कैडरों को मिलता था शिकार का मांस

जगदलपुर। बस्तर के अबूझमाड़ के जंगलों में बंदूक और खौफ की जो दुनिया बाहर से रहस्यमयी दिखती है, भीतर से वह उतनी ही भेदभावपूर्ण और कठिन है। यह खुलासा किया है पूर्व माओवादी फगनी उसेंडी ने, जो महज 10 साल की उम्र में संगठन से जुड़ीं और 11 साल तक माओवादियों की ‘डॉक्टर’ और ‘मास्टरनी’ बनकर रहीं। फगनी अब सरेंडर के बाद जगदलपुर के पंडुम कैफे में नई जिंदगी शुरू कर चुकी हैं।
बड़े नेताओं की ऐशगाह, कैडरों के लिए संघर्ष
फगनी शीर्ष माओवादी नेता के. सत्यनारायण रेड्डी उर्फ कोसा की टीम का हिस्सा थीं। उन्होंने बताया कि जहां आम कैडर जमीन पर सोकर रात गुजारते थे, वहीं कोसा जैसे बड़े नेताओं के लिए जंगल में भी खास इंतजाम होते थे। कोसा को दूध वाली चाय और सिगरेट का शौक था, जिसकी आपूर्ति गांवों के जरिए उसकी पत्नी राधक्का सुनिश्चित करती थी। बड़े नेताओं के लिए हिरण, जंगली सूअर और पेंगोलिन जैसे जानवरों का शिकार कर मांस पकाया जाता था।
अबूझमाड़ में 800 कैडरों का ट्रेनिंग कैंप
फगनी के मुताबिक, माओवादियों ने महाराष्ट्र सीमा के पास अबूझमाड़ के घने जंगलों में सैकड़ों पेड़ काटकर एक विशाल गुरिल्ला ट्रेनिंग सेंटर बना रखा था।
वहां एक साथ 700 से 800 कैडरों को बम बनाने और बंदूक चलाने की ट्रेनिंग दी जाती थी।
उफनती नदियों को पार करना और घायल साथियों को पीठ पर लादकर भागने का कड़ा अभ्यास कराया जाता था।
सूचनाओं के लिए रेडियो और लैपटॉप का इस्तेमाल होता था, लेकिन मोबाइल पर सख्त पाबंदी थी।
बस्तर के युवाओं को बनाया ‘ढाल’
फगनी ने एक बड़ा सच यह उजागर किया कि ताड़मेटला या झीरम जैसे बड़े हमलों की रणनीति बनाने वाले शीर्ष नेता (गणपति, कोसा, देवजी) कभी खुद सीधे लड़ाई में नहीं उतरे। वे हमेशा बस्तर के स्थानीय भोले-भाले युवाओं को सुरक्षा बलों के सामने ‘ढाल’ बनाकर भेजते थे और खुद 20-20 हथियारबंद गार्डों के घेरे में सुरक्षित रहते थे।





