हाईकोर्ट ने 20 साल बाद रेप केस में आरोपी को किया बरी, कहा– सहमति से बने संबंध को दुष्कर्म नहीं माना जा सकता

शादी का झांसा देकर शारीरिक संबंध बनाने से जुड़े एक पुराने मामले में हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए आरोपी युवक को दोषमुक्त कर दिया है। अदालत ने कहा कि यदि महिला बालिग है और उसकी सहमति से शारीरिक संबंध बने हैं, तो हर स्थिति में इसे दुष्कर्म नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर कोर्ट ने लोअर कोर्ट द्वारा दी गई सजा को अवैध बताते हुए उसे निरस्त कर दिया।

मामला सरगुजा जिले के धौरपुर थाना क्षेत्र से जुड़ा है। जानकारी के अनुसार साल 2000 में युवती 12वीं कक्षा की छात्रा थी और धौरपुर क्षेत्र में किराए के मकान में रहती थी। उसी दौरान लीना राम ध्रुव नाम का युवक भी पढ़ाई कर रहा था। दोनों के बीच पहले दोस्ती हुई और बाद में प्रेम संबंध बन गए।

आरोप था कि युवक उसी मकान में रहने लगा और 8 सितंबर 2000 को शादी का झांसा देकर युवती के साथ शारीरिक संबंध बनाए। युवती का कहना था कि इसके बाद करीब तीन साल तक दोनों के बीच संबंध बने रहे। पढ़ाई पूरी होने के बाद दोनों अपने-अपने गांव लौट गए, लेकिन उनके बीच मुलाकातें जारी रहीं।

युवती ने आरोप लगाया कि 16 मई 2003 को वह युवक के घर गई, जहां कुछ दिन रहने के बाद उसने शादी की बात कही। इसके बाद 11 जून 2003 को युवक उसे छोड़कर चला गया और वापस नहीं लौटा। करीब दो महीने इंतजार करने के बाद युवती ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई।

पुलिस ने मामले में आरोपी के खिलाफ दुष्कर्म का केस दर्ज कर उसे गिरफ्तार किया और न्यायिक हिरासत में भेज दिया। जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने ट्रायल कोर्ट में चालान पेश किया। सुनवाई के बाद अंबिकापुर की सत्र अदालत ने आरोपी को दोषी मानते हुए सात साल के कारावास और पांच हजार रुपए के जुर्माने की सजा सुनाई थी।

इस फैसले के खिलाफ आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील दायर की। सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि घटना के समय महिला बालिग थी और उसे अपने निर्णय के परिणामों की जानकारी थी। ऐसे में यह संबंध सहमति से बने माने जाएंगे।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि केवल शादी का वादा कर संबंध बनाना हर मामले में दुष्कर्म नहीं माना जा सकता। जब तक यह साबित न हो कि आरोपी ने शुरू से ही शादी करने का कोई इरादा नहीं रखा और केवल शारीरिक संबंध बनाने के लिए धोखा दिया, तब तक इसे दुष्कर्म की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद करीब 20 साल बाद अदालत ने आरोपी को दोषमुक्त कर दिया और लोअर कोर्ट के फैसले को निरस्त कर दिया।

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