रिटायर्ड फौजी की पहल से बदली खेती की तस्वीर, 100 एकड़ में पराली जलने से रोकी

छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले में एक रिटायर्ड फौजी ने खेती के क्षेत्र में नई मिसाल पेश की है। जगमहंत निवासी सेवानिवृत्त एसीपी शैलेन्द्र सिंह बनाफर ने रीपर मशीन के माध्यम से पराली जलाने की परंपरा पर रोक लगाकर पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ खेती को बढ़ावा दिया है।
सेना सेवा के दौरान भी उनका झुकाव खेती की ओर रहा। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने अपने गांव में 12 एकड़ निजी भूमि सहित करीब 20 एकड़ में खेती शुरू की। धीरे-धीरे उन्होंने आधुनिक तकनीक और जैविक तरीकों को अपनाकर खेती को लाभकारी बनाया।
पहले गांव में धान की कटाई के बाद पराली जलाई जाती थी, जिससे प्रदूषण बढ़ता और मिट्टी की उर्वरता घटती थी। पराली जलने से आसपास के लोगों को भी परेशानी होती थी। इस समस्या को देखते हुए बनाफर ने रीपर मशीन का उपयोग शुरू किया, जिससे पराली को काटकर चारा और खाद के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा।
इस वर्ष उन्होंने करीब 100 एकड़ भूमि में पराली जलने से रोकी। काटी गई पराली का उपयोग मवेशियों के चारे और जैविक खाद के रूप में किया गया। उन्होंने गांव के गोठान को दो ट्रैक्टर पैरा भी दान किए, जिससे पशुपालकों को लाभ मिला।
इस तकनीक से मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार हुआ, यूरिया और रासायनिक खाद की आवश्यकता कम हुई और खेती की लागत भी घटी। खेत अधिक उपजाऊ बने और उत्पादन में वृद्धि दर्ज की गई।
बनाफर ने गांव के अन्य किसानों को भी इस पद्धति से जोड़ा। उनकी प्रेरणा से कई किसान अब पराली जलाने के बजाय उसका उपयोग खाद और चारे के रूप में करने लगे हैं। उन्होंने आवारा पशुओं को आश्रय देकर पराली का उपयोग उनके चारे के लिए भी किया, जिससे पशुओं की समस्या में कमी आई।
पहले अधिक रासायनिक खाद के कारण मिट्टी बंजर होती जा रही थी। अब गोबर खाद और कम्पोस्ट के प्रयोग से मिट्टी का संतुलन लौट रहा है। उन्होंने सब्जियों की ऑर्गेनिक खेती भी शुरू की है, जिससे परिवार की जरूरतें पूरी हो रही हैं।
उनकी पहल से गांव में खेती के प्रति नई जागरूकता आई है। युवा किसान फिर से खेती की ओर लौट रहे हैं और आधुनिक व पर्यावरण अनुकूल तरीकों को अपना रहे हैं। बनाफर का मानना है कि सेना में देश की सेवा के बाद अब धरती की सेवा करना उनका उद्देश्य है।





