बच्चों को बहकाकर संगठन से जोड़ते थे, अब सीख रहे हुनर: आत्मसमर्पित नक्सलियों की नई जिंदगी

छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले में स्थित लाइवलीहुड कॉलेज अब एक सामान्य शिक्षण संस्थान नहीं, बल्कि आत्मसमर्पित नक्सलियों के पुनर्वास का केंद्र बन चुका है। यहां 110 पूर्व नक्सली रहकर सिलाई, ड्राइविंग, मैकेनिक, सोलर और नल मरम्मत जैसे कौशल सीख रहे हैं। सुरक्षा कारणों से कॉलेज परिसर में कड़ी निगरानी रहती है और बिना अनुमति किसी को प्रवेश नहीं दिया जाता।
कभी हाथों में हथियार लेकर संघर्ष करने वाले ये लोग अब शांत जीवन की ओर बढ़ रहे हैं। इनमें से कई पर पहले लाखों रुपए का इनाम घोषित था। लंबे समय तक जंगलों में रहने के बाद अब वे समाज की मुख्यधारा में लौटने का प्रयास कर रहे हैं।
पंडीराम ध्रुव बताते हैं कि गांवों में नाटकों और प्रचार के जरिए युवाओं को संगठन से जोड़ा जाता था। जल, जंगल और जमीन बचाने के नाम पर उन्हें प्रभावित किया जाता था। धीरे-धीरे उन्हें हथियार चलाना सिखाया जाता और मुठभेड़ों में शामिल किया जाता।
सुखलाल ने बताया कि वे कम उम्र में संगठन से जुड़े और बाद में उन्हें प्राथमिक इलाज और छोटी सर्जरी तक की ट्रेनिंग दी गई। मुठभेड़ों में घायल साथियों का इलाज करते-करते उन्होंने कई जिंदगियां बचाईं, लेकिन लगातार बढ़ते दबाव और मौतों ने उन्हें आत्मसमर्पण के लिए मजबूर कर दिया।
दिवाकर गावड़े ने जंगल में हथियार बनाने की जानकारी साझा की। वे बीजीएल और 12 बोर जैसी बंदूकें तैयार करते थे, जिनका इस्तेमाल कई मुठभेड़ों में हुआ। पुलिस कार्रवाई के डर से उन्होंने भी संगठन छोड़ दिया।
रमली और कमला जूरी जैसी महिलाएं भी नक्सली संगठन का हिस्सा रहीं। उन्होंने बताया कि उन्हें अन्याय के खिलाफ लड़ने के नाम पर प्रेरित किया गया था। जंगल की जिंदगी, लगातार पलायन और डर ने उनके मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डाला।
कमला जूरी ने बताया कि संगठन में शादी के बाद पुरुषों की नसबंदी कराई जाती थी, ताकि परिवार की जिम्मेदारी उन्हें संघर्ष से दूर न कर सके। इसे संगठन की मजबूरी और रणनीति के रूप में बताया जाता था।
कॉलेज के प्राचार्य के अनुसार, कई आत्मसमर्पित नक्सली आज भी अपने अतीत से बाहर नहीं निकल पाए हैं। कुछ लोग हंसते तक नहीं और गांव लौटने से डरते हैं। हालांकि, वे अनुशासित हैं और सीखने की गहरी इच्छा रखते हैं।
पुनर्वास केंद्र में इन्हें नई पहचान देने का प्रयास किया जा रहा है। सरकार और प्रशासन का उद्देश्य है कि ये लोग आत्मनिर्भर बनकर समाज में सम्मान के साथ जीवन जी सकें। जंगल की हिंसक जिंदगी से निकलकर अब ये लोग शांति और स्थिरता की ओर बढ़ रहे हैं।





